ठाकुर उदय सिंह जी के स्वर्गवास पर उनके एक मात्र पुत्र मंगल सिंह खुड जागीर के अधिपति बने। ठाकुर मंगल सिंह जी का जन्म सन १९१२ में हुआ था और उनकी शिक्षा अजमेर के मेयो कालेज में हुई थी। ठाकुर मंगल सिंह जी राजस्थान में अपने प्रकार के अपने युग के एक मात्र व्यक्ति थे। स्वतंत्रता प्रेमी, समाज सुधारक, राष्ट्र भक्त, गाँधी जी के खादी ग्रामोद्योग कार्यक्रम के समर्थक, गो-सेवक, शिक्षा प्रेमी और उच्च विचारों के तपस्वी पुरुष थे। रियासत काल में उन्होंने अपने ठिकाने में कई पाठशालायें और रुपगढ़ ग्राम में श्री रामप्रताप ग्राम सुधार आवासीय हाई स्कूल की स्थापना की जिसमे खुड ठिकाने के ग्रामो के अलावा उदयपुरवाटी, सीकर वाटी , नागौर व दांता-रामगढ ठिकाने के गांवों के विद्यार्थी विद्यार्जन करते थे। ठाकुर मंगल सिंह जी महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय जयपुर के सहपाठी ऐ.डी.सी. और सवाई मानगार्ड में केप्टन रहे। राजकीय सेवा से त्याग पत्र देकर उन्होंने ग्राम सुधार और क्षत्रिय-संगठन के लिए अपना जीवन समर्पित किया और जीवन पर्यन्त खादी के वस्त्रों का उपयोग किया। राजस्थान स्वयं सैनिक-समाज,रामराज्य सभा आदि संस्थाओं के वे प्रमुख संस्थापकों में थे। प्रसिद्ध देश भक्त जमनालाल बजाज, प. हीरालाल शास्त्री, रावल नरेन्द्र सिंह जोबनेर, महाराव उम्मेद सिंह कोटा, महाराजा उम्मेद सिंह जोधपुर,योगिराज अरविन्द, स्वामी करपात्री जी, सदाशिव माधव राव गोलवलकर, महाराजा राम सिंह सीतामऊ, महाराजा राणा भवानी सिंह दांताभावानगढ़, भारत के प्रथम राष्ट्रपति बाबू राजेंद्रप्रसाद आदि से आपका अति-स्नेह सम्बन्ध था। सीकर और जयपुर के मध्य १९३८ के संघर्ष और १९४२ की उदयपुर वाटी पर जयपुर की सेन्य चढाई का उन्होंने सामना कर अपने भाइयों के सम्मान और अधिकारों के लिए नेतृत्त्व ग्रहण कर जयपुर राज्य के कोपभाजन बनने का खतरा मोल लिया था। जागीर उन्मूलन के पश्चात उन्होंने अपने ठिकाने के घोडे़ और गायें भी सदाकत आश्रम पटना, वनस्थली विद्यापीठ जयपुर, चौपासनी विधालय जोधपुर और अपने ठिकाने के ग्रामवासियों और कवियों को प्रदान कर अपनी उदारता और समाज हितैषिता का परिचय दिया था। हिंसकजीवों की आखेट,घोडे़ और गो-पालन की और उनकी आजीवन रूचि बनी रही। वे सादा रहन-सहन और उच्च विचार कथनोक्ति के साक्षात् प्रतिरूप थे। उनकी देश भक्ति ,समाज प्रेम और शीलता आदि गुणों का कई कवियों ने अपनी रचनाओं में उल्लेख किया है। ४ फरवरी १९७६ को आपका निधन हो गया।
डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, सरदार वल्लभ भाई पटेल, शहीद भगत सिंह, वीर कुंवर सिंह, लोकनायक,झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, बहादुर शाह ज़फ़र, तात्या टोपे, खुदीराम बोस, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी , मदर टेरेसा , चंद्रशेखर आजाद , सरोजिनी नायडू , केसरी सिंह बारहट , दादा भाई नौरोजी , विद्यापति , गुरु गोबिन्द सिंह , फणीश्वर नाथ ' रेणु ' , ठाकुर मंगल सिंह, खुड़ , लालबहादुर शास्त्री ,
ठाकुर मंगल सिंह, खुड़
ठाकुर उदय सिंह जी के स्वर्गवास पर उनके एक मात्र पुत्र मंगल सिंह खुड जागीर के अधिपति बने। ठाकुर मंगल सिंह जी का जन्म सन १९१२ में हुआ था और उनकी शिक्षा अजमेर के मेयो कालेज में हुई थी। ठाकुर मंगल सिंह जी राजस्थान में अपने प्रकार के अपने युग के एक मात्र व्यक्ति थे। स्वतंत्रता प्रेमी, समाज सुधारक, राष्ट्र भक्त, गाँधी जी के खादी ग्रामोद्योग कार्यक्रम के समर्थक, गो-सेवक, शिक्षा प्रेमी और उच्च विचारों के तपस्वी पुरुष थे। रियासत काल में उन्होंने अपने ठिकाने में कई पाठशालायें और रुपगढ़ ग्राम में श्री रामप्रताप ग्राम सुधार आवासीय हाई स्कूल की स्थापना की जिसमे खुड ठिकाने के ग्रामो के अलावा उदयपुरवाटी, सीकर वाटी , नागौर व दांता-रामगढ ठिकाने के गांवों के विद्यार्थी विद्यार्जन करते थे। ठाकुर मंगल सिंह जी महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय जयपुर के सहपाठी ऐ.डी.सी. और सवाई मानगार्ड में केप्टन रहे। राजकीय सेवा से त्याग पत्र देकर उन्होंने ग्राम सुधार और क्षत्रिय-संगठन के लिए अपना जीवन समर्पित किया और जीवन पर्यन्त खादी के वस्त्रों का उपयोग किया। राजस्थान स्वयं सैनिक-समाज,रामराज्य सभा आदि संस्थाओं के वे प्रमुख संस्थापकों में थे। प्रसिद्ध देश भक्त जमनालाल बजाज, प. हीरालाल शास्त्री, रावल नरेन्द्र सिंह जोबनेर, महाराव उम्मेद सिंह कोटा, महाराजा उम्मेद सिंह जोधपुर,योगिराज अरविन्द, स्वामी करपात्री जी, सदाशिव माधव राव गोलवलकर, महाराजा राम सिंह सीतामऊ, महाराजा राणा भवानी सिंह दांताभावानगढ़, भारत के प्रथम राष्ट्रपति बाबू राजेंद्रप्रसाद आदि से आपका अति-स्नेह सम्बन्ध था। सीकर और जयपुर के मध्य १९३८ के संघर्ष और १९४२ की उदयपुर वाटी पर जयपुर की सेन्य चढाई का उन्होंने सामना कर अपने भाइयों के सम्मान और अधिकारों के लिए नेतृत्त्व ग्रहण कर जयपुर राज्य के कोपभाजन बनने का खतरा मोल लिया था। जागीर उन्मूलन के पश्चात उन्होंने अपने ठिकाने के घोडे़ और गायें भी सदाकत आश्रम पटना, वनस्थली विद्यापीठ जयपुर, चौपासनी विधालय जोधपुर और अपने ठिकाने के ग्रामवासियों और कवियों को प्रदान कर अपनी उदारता और समाज हितैषिता का परिचय दिया था। हिंसकजीवों की आखेट,घोडे़ और गो-पालन की और उनकी आजीवन रूचि बनी रही। वे सादा रहन-सहन और उच्च विचार कथनोक्ति के साक्षात् प्रतिरूप थे। उनकी देश भक्ति ,समाज प्रेम और शीलता आदि गुणों का कई कवियों ने अपनी रचनाओं में उल्लेख किया है। ४ फरवरी १९७६ को आपका निधन हो गया।
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